कोहिनूर वापस लाने या इसकी नीलामी रोकने का आदेश हम नहीं दे सकते: सुप्रीम कोर्ट

दिल्ली

सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार (21 अप्रैल) को कहा कि वह ब्रिटेन को कोहिनूर हीरा लौटाने या उसे नीलाम न करने का आदेश नहीं दे सकता. सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने एनजीओ ऑल इंडिया ह्यूमन राइट्स एंड सोशल जस्टिस की कोहिनूर हीरा को देश में वापस लाने का निर्देश देने संबंधी याचिका खारिज करते हुए यह कहा.

केहर ने कहा, “हम हैरान हैं कि एक भारतीय अदालत ब्रिटेन में मौजूद किसी चीज को वापस लाने का आदेश कैसे दे सकती है?” पीठ ने कहा, “क्या हम यह आदेश दे सकते हैं कि ब्रिटेन को कोई संपत्ति नीलाम नहीं करनी चाहिए?”

याचिकाकर्ता एनजीओ ने अदालत से यह आदेश देने की मांग की थी कि ब्रिटेन कोहिनूर हीरे की नीलामी न करे. पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि अदालत सरकार के जवाब से संतुष्ट है कि वह हीरा वापस लाने का प्रयास कर रही है.

बता दें कि ब्रिटिश सरकार ने 2013 में कोहिनूर वापस देने की मांगों को खारिज कर दिया था. रोचक बात है कि 1850 में डलहौजी के मार्कीज ने पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह को कोहिनूर हीरा क्‍वीन विक्‍टोरिया को उपहार में देने को बाध्‍य किया था. कोहिनूर की कीमत 200 मिलियन डॉलर आंकी जा रही है.

105 कैरट का कोहिनूर करीब 150 साल से ज़्यादा वक्त से ब्रिटिश ताज का हिस्सा रहा है. माना जाता है कि यह आंध्र प्रदेश के गोलकुंडा के एक खान से निकला था. शुरुआत में कोहिनूर हीरा पूरे 720 कैरेट का हुआ करता था. कई सालों तक यह खिलजी वंश के खजाने में रहा. इसके बाद यह मुगल शासक बाबर के पास पहुंचा. शाहजहां के मयूर सिंहासन से होता हुआ यह कोहिनूर हीरा महाराज रंजीत सिंह तक पहुंचा.

कहा जाता है कि यह हीरा 1848 के ब्रिटेन-सिख युद्ध के बाद ब्रिटेन के हाथ उस वक्त आया जब नाबालिग दलीप सिंह ने इसे ब्रितानी शासकों को सौंप दिया था. तभी से कोहिनूर ब्रितानी ताज में लगा हुआ है. ब्रिटेन का दावा है कि नाबालिग दलीप सिंह ने कोहिनूर क़ानूनी आधार पर उन्हें दिया, लेकिन भारतीय इतिहासकारों का तर्क है कि ऐसा नहीं हुआ और दलीप सिंह को कोहिनूर देने के लिए मजबूर किया गया.

माना जाता है कि यह हीरा अभिशप्‍त है. जिस राजवंश के पास गया, वो खत्‍म हो गया. कहा जाता है कि 14 वीं शताब्दी की शुरुआत में यह हीरा काकटीय वंश के पास आया. इसके बाद से इस वंश के बुरे दिन शुरू हो गए और 1323 में तुगलक शाह प्रथम से लड़ाई में हार के साथ काकटीय वंश समाप्त हो गया. तुगलक वंश भी ज्‍यादा समय तक नहीं चला.

यह हीरा तुगलक से मुगलों तक पहुंचा. 16वीं सदी में शाहजहां ने इस कोहिनूर हीरे को अपने सिंहासन में जड़वाया. 1739 में फारसी शासक नादिर शाह भारत आया और उसने मुगल सल्तनत पर कब्‍जा कर लिया. वह कोहिनूर हीरे को फारस ले गया. 1747 ई. में नादिरशाह की हत्या हो गई और कोहिनूर हीरा अफ़गानिस्तान के शहंशाह अहमद शाह दुर्रानी के पास पहुंच गया. 1813 में अफ़गानिस्तान से यह लाहौर के राजा रंजीत सिंह के पास आ गया. जब रंजीत सिंह मौत के करीब थे तब उन्होंने कोहिनूर को उड़ीसा के एक हिंदू मंदिर को देने की बात वसीयत में लिखी, लेकिन उनकी मौत के बाद ब्रितानी शासकों ने वसीयत पर अमल नहीं किया.

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