जलियांवाला बाग नरसंहार के 98 साल, पढ़ें इतिहास

जलियांवाला बाग नरसंहार भारतीय इतिहास के सबसे काले अध्यायों में एक है। आज ही के दिन 13 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश लेफ्टिनेंट जनरल रेगिनाल्ड डायर ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में बैसाखी के मौके पर इकट्ठे हजारों निहत्थे मासूम भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दी थीं।

1000-2000 भारतीय इस गोलीबारी में मारे गए थे। इससे कहीं ज्यादा गंभीर रूप से घायल हुए थे। डायर ने बाग से निकलने के सारे रास्ते बंद करवा दिए थे। बाग में जाने का जो एक रास्ता खुला था जनरल डायर ने उस रास्ते पर हथियारबंद गाड़ियां खड़ करवा दी थीं। वो करीब 100 सिपाहियों के संग बाग के गेट तक पहुंचा। उसके करीब 50 सिपाहियों के पास बंदूकें थीं। उसने वहां पहुंचकर बगैर किसी चेतावनी के गोली चलाने का आदेश दे दिया। गोलीबारी से लोग पेड़ों की तरह कटकर गिरने लगे। कई मासूम भारतीय गोलीबारी से बौखला कर बाग में स्थित एक कुएं में कूदने लगे। गोलीबारी के बाद कुएं से 200 से ज्यादा शव बरामद हुए थे।
डायर को इस कुकृत्य के लिए जलियांवाला बाग का कसाई कहा जाता है। भारतीय स्वतंत्रा संग्राम में इस घटना की निर्णायक भूमिका मानी जाती है। अक्टूबर 1919 में ब्रिटिश सरकार ने पंजाब में हुए कुकृत्य की जांच के लिए हंटर कमेटी का गठन किया। इस कमेटी के आठ सदस्यों में से तीन भारतीय थे।  हंटर कमेटी की सुनवाई के दौरान 19 नवंबर 1919 को लाहौर में सुनवाई के दौरान डायर ने सर चिमनलाल सीतलवाड़ के सवालों का जवाब दिया। सीतलावाड़ ने अपनी आत्मकथा “रिकलेक्शनंस एंड रिफ्लेक्शंस” में इस वाकये का जिक्र किया है। नीचे हम आपको सीतलवाड़ के सवाल और डायर के जवाब का एक अंश दे रहे हैं-

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