अवैध कब्जा मामला: पॉलिसी बनाने के लिए HC ने दी मंजूरी

हिमाचल हाईकोर्ट ने पांच बीघा तक सरकारी और वन भूमि पर किए कब्जों को नियमित करने के लिए सरकार को पॉलिसी लाने की इजाजत दे दी है। कोर्ट ने सरकार की ओर से बनाए गए प्रारूप नियमों के प्रकाशन की इजाजत के लिए दायर आवेदन का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किए।

मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने सरकार के आवेदन पर यह आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया कि इस इजाजत को यह कतई न समझा जाए कि कोर्ट ने प्रस्तावित पॉलिसी की वैधता को सही ठहरा दिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि पॉलिसी पर कोई भी कोर्ट में चुनौती देता है तो उस स्थिति में उस पॉलिसी की कानूनी वैधता किसी भी समय परखी जा सकेगी। अब मामले पर सुनवाई 25 अप्रैल को होगी।

इन कब्जों पर ही मिलेगा मालिकाना हक
बता दें कि सरकार ने इस आवेदन के साथ भू राजस्व अधिनियम के तहत बनाए गए उन प्रारूप नियमों की प्रति भी पेश की थी, जिसके तहत सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों को राहत देने के नियम बनाए गए हैं। सरकार की ओर से पेश प्रारूप पॉलिसी के अनुसार शहरों में 2 बिस्वा और ग्रामीण इलाकों में अधिकतम 5 बीघा तक कब्जाई गई भूमि का मालिकाना हक देने का प्रस्ताव है।

अवैध कब्जों पर मालिकाना हक 28 अगस्त 2015 से पहले के कब्जाधारियों को एसडीएम अथवा सहायक सेटलमेंट अधिकारी द्वारा दिया जाना है। प्रारूप के अनुसार ग्रामीण इलाकों के कब्जाधारियों की कुल भूमि अवैध कब्जा मिलाकर 10 बीघा से अधिक नहीं होनी चाहिए।

ये कब्जे नहीं होंगे नियमित
ग्रामीणों के आम उद्देश्य के लिए इस्तेमाल होने वाली भूमि जैसे सड़क, जंगल, मेले के आयोजनों के लिए मैदान, चरागाह, अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए इस्तेमाल होने वाले मैदान, आम रास्ते, कब्रिस्तान, श्मशानघाट, तालाब, नहर, कूहल और चेक डेम पर किए गए कब्जों का मालिकाना हक किसी भी सूरत में नहीं दिया जाएगा। इसके अलावा जिस वन भूमि के लिए केंद्र की मंजूरी की जरूरत होगी, वह केंद्र सरकार से मांगी जाएगी।

3 से 5 बीघा तक प्रति बीघा लगेंगे 10,000 रुपये
सरकार ने प्रारूप में 2 बीघा तक की भूमि के लिए 5,000 रुपये प्रति बीघा शुल्क प्रस्तावित किया है। 3 से 5 बीघा तक की भूमि के लिए 10,000 रुपये प्रति बीघा देने होंगे।

हाईकोर्ट ने सत्र 2017-18 एमडी, एमएस प्रवेश परीक्षा के लिए पिछड़ा और जनजातीय क्षेत्र में काम कर चुके डॉक्टरों को अतिरिक्त अंक देने बाबत राज्य सरकार की ओर से तय क्षेत्रों में फेरबदल करने से इंकार कर दिया है। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश संदीप शर्मा की खंडपीठ ने राज्य सरकार के उस प्रावधान को गलत ठहराया है, जिसके तहत उक्त क्षेत्रों में काम करने वाले कुल महीनों और दिनों के बजाए केवल साल के आधार पर अतिरिक्त अंक देने का प्रावधान बनाया गया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुपात के आधार पर इन क्षेत्रों में काम कर चुके डॉक्टरों को अंक दिए जाएं ताकि इन क्षेत्रों में दी सारी सेवा का लाभ उन्हें मिल सके। गौर हो कि राज्य सरकार ने अतिरिक्त अंक देने के लिए 1 साल के लिए 10 फीसदी अंक, 2 साल के लिए 20 फीसदी अंक और 3 साल के लिए 30 फीसदी अंक देने का प्रावधान बनाया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिछड़ा और जनजातीय क्षेत्र में दी गई सारी सेवाओं को महीनों और दिनों सहित अतिरिक्त अंकों के लिए आंका जाना न्यायोचित होगा।

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