यूपी में लागू होगा गुजरात का ‘पावरफुल’ मॉडल, मिलेगी 24 घंटे बिजली !

उत्तर प्रदेश के दो मंत्री श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थ नाथ सिंह ने केन्द्रीय उर्जा मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात की है. इस मुलाकात में मंत्रियों ने 2018 तक यूपी में 24 घंटे बिजली सप्लाई देने के लिए रोडमैप तैयार करने पर जोर दिया. इस रोडमैप में गुजरात के सबसे पॉवरफुल मॉडल को शामिल किया जाएगा जिससे प्रदेश में 2-3 साल के अंदर 24 घंटे बिजली सप्लाई को सुनिश्चित किया जा सकेगा.

यूपी आएगा गुजरात का सबसे पॉवरफुल मॉडल
16वीं लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद देश में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार सत्ता पर काबिज हुई थी. यह सरकार ऐसे समय में बनी जब देश में बिजली संकट सबसे गंभीर समस्या थी और सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी. प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी ने गुजरात प्रदेश की कमान 2001 में संभाली और उस वक्त गुजरात बिजली के संकट से बुरी तरह ग्रस्त था. लेकिन अपने दस साल के कार्यकाल के दौरान मोदी ने गुजरात में पॉवर सेक्टर की तस्वीर को पलट कर रख दिया.

जिस प्रदेश के शहरों में रात का खाना खाते वक्त बिजली नहीं आती थी, गांवों में खेती के लिए तो बिजली दूर की कौड़ी थी, आज उसी राज्य में इंडस्ट्रियल और रिहायशी उपयोग के बाद बिजली बच रही है. यही नहीं बची हुई बिजली पड़ोसी राज्यों को बेचकर हुए मुनाफे से राज्य में नए पॉवर प्लांट्स के जरिए बिजली की पैदावार बढ़ाई.

अब चुनौती पूरे देश में गुजरात के पावर सेक्टर के इस सबसे पॉवरफुल मॉडल को लागू करने की है. इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से होने जा रही है. प्रदेश में बीजेपी की सरकार बन चुकी है और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की पहली प्राथमिकता पीएम मोदी के सपनों को साकार करने की है. 2014 में मोदी ने वादा किया था कि पूरे देश में वह बहुत जल्द गुजरात की तरह बिजली सप्लाई बहाल कर देंगे. अब देखना ये है कि देश के सबसे बड़े क्षेत्रफल, सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में गुजरात का ये मॉडल किस तरह लागू किया जाता है.

2001 में ऐसी थी गुजरात में पॉवर सप्लाई
गुजरात इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (जीएसईबी) ने वित्त वर्ष 2000-01 में 2,246 करोड़ का नुकसान दर्ज किया था. जीएसईबी का वार्षिक रेवन्यू 6280 करोड़ रुपए था. जीएसईबी को ब्याज अदा करने में अकेले 1227 करोड़ खर्च करना था और ट्रांस्मीशन और डिस्ट्रीब्यूशन पर नुकसान 35 फीसदी से ज्यादा था. इस स्थिति में रेवेन्यू की खस्ता हालत के चलते राज्य के पास बिजली का प्रोक्शन बढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे. इसके चलते निजी सेक्टर को भी निवेश में कोई फायदा नहीं दिख रहा था.

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