पंजाब-हरियाणा HC ने कहा, ‘जाति के आधार पर न्यायालयों को विभाजित नहीं होने दिया जाएगा’

जज के पद पर आसीन होने से पहले जो संवैधानिक शपथ ली जाती है, उसमें जाति और किसी से प्रभावित न होने की कसम ली जाती है। यदि बिना किसी ठोस आधार के जजों से केस से हटने की अपील स्वीकार कर ली जाए तो यह सीधे तौर पर पदभार के दौरान ली गई संवैधानिक शपथ को भंग करने जैसा है।

उस कुर्सी पर बैठने वाले की न तो कोई जाति होती है और न ही उसमें कोई भावना उसकी जाति, धर्म और भावना केवल इंसाफ होता है। जाट आरक्षण मामले की सुनवाई कर रहे दोनों जजों के जट सिख होने के चलते उन्हें सुनवाई से हटने की अपील वाली अर्जी को खारिज करते हुए जस्टिस एसएस सारौं और जस्टिस लीज़ा गिल की खंडपीठ ने अपने आदेश में ये बातें कहीं।

हाईकोर्ट ने इस बारे में विस्तृत आदेश जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि चीफ जस्टिस द्वारा जज को किसी केस की जिम्मेदारी दी जाती है तो उस स्थिति में वह खुद को केस से पीछे हट सकते हैं लेकिन उनसे पीछे हटने की अपील नहीं की जा सकती जब तक कोई ठोस कारण नहीं दिया जाता। यह जज का अधिकार है कि वह निर्धारित करे कि कौन से केस को सुनना है और कौन से केस से पीछे हटना है।

यह था मामला
कोर्ट ने कहा कि केस से पीछे हटने की जाति आधारित अपील न्यायालय को जाति के आधार पर बांटने वाली है और ऐसा होने नहीं दिया जाएगा। साथ ही कोर्ट की आव्जर्वेशन पर जजमेंट में लिखा गया कि कोर्ट की कार्रवाई के दौरान कई बार केस से जुड़ी टिप्पणियां की जाती हैं लेकिन इन टिप्पणियों को जज की राय नहीं मानना चाहिए क्योंकि जज तथ्यों पर आधारित फैसला सुनाते हैं।

बेंच ने कहा कि हम यदि इस केस में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं है और वे यदि इस केस से पीछे हटना भी चाहें तो संविधान के प्रति जज के तौर पर जो उनका कर्तव्य है वह उन्हें इस केस से पीछे हटने से रोकता है। ऐसे में संविधान के प्रति अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देते हुए वे इस केस के साथ आगे जारी रहेंगे और यही बेंच इस मामले की आगे सुनवाई करेगी। इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट ने जजों से केस से पीछे हटने की अपील वाली अर्जी खारिज कर दी।

यह था मामला
हरियाणा में जाटों सहित छह जातियों को आरक्षण के हरियाणा सरकार के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान यादव महासभा ने अर्जी दाखिल कर बेंच के दोनों जजों के जटसिख होने की बात कही थी। सभा की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि आरक्षण का लाभ उस जाति को भी दिया जा रहा है जिससे दोनों जज जुड़े हैं। ऐसे में फैसला प्रभावित हो सकता है ऐसी उन्हें आशंका है इसलिए सुनवाई किसी दूसरे बेंच को रेफर की जाए। हरियाणा सरकार की ओर से कहा गया था कि जज पद की शपथ लेते हुए किसी भी तरह से प्रभावित न होने की बात कही जाती है और यदि इस केस से बेंच पीछे हटी तो संविधान के लिए काला दिन होगा।

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