हाईकोर्ट ने सुरक्षित रखा जाट आरक्षण पर फैसला

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने जाटों सहित 6 जातियों को दिए गए आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस तरह जाट आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट में बहस और दलीलों के दौर पर 10 महीने बाद जाकर विराम लगा है। सोमवार को हरियाणा सरकार की ओर से इस केस में सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट जगदीप धनकड़ ने बहस की।

जस्टिस एसएस सारौं और जस्टिस लीज़ा गिल की विशेष खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान याची पक्ष, जाटों का पक्ष तथा सरकार की ओर से दलीलें दी गईं। सोमवार को अंतिम बहस के दौरान आरक्षण के लिए आधार बनाए गई खजान सिंह सांगवान की रिपोर्ट को याची ने फिर से कटघरे में खड़ा किया। याची पक्ष की ओर से एडवोकेट पृथ्वीराज यादव, मुकेश वर्मा तथा लाल बहादुर खोवाल ने कहा कि सांगवान की रिपोर्ट में उन सभी मानकों के तहत सर्वे नहीं किया गया है, जो इंदिरा साहनी मामले में निर्धारित हैं।

मंडल कमीशन द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़ों का ब्यौरा देते हुए याची ने बताया कि उस दौरान 405 जिलों से आंकड़े एकत्रित किए गए थे और प्रत्येक जिले से दो गांवों और एक ब्लॉक का चयन किया गया था। इस दौरान जिन स्थानों को चुना गया, उनमें से प्रत्येक घर से आंकड़े एकत्रित किए गए थे। उस समय भी विभिन्न संकेतकों का इस्तेमाल किया गया था और हर संकेतक का अलग स्कोर तय किया गया था।

उन आंकड़ों के हिसाब से ही उस समय आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, लेकिन खजान सिंह के आंकड़े पूरी तरह से फर्जी थी। इन्हें आधार बनाकर ही केसी गुप्ता आयोग की रिपोर्ट पर केंद्र में हरियाणा के जाटों को आरक्षण का लाभ दिया गया था। इन आंकड़ों पर पहले एनसीबीसी ने आपत्ति जताई थी और फिर सुप्रीम कोर्ट ने एनसीबीसी द्वारा जताई गई आपत्ति को सही करार दिया था।

ऐसे में जिन आंकड़ों के आधार पर केंद्र में आरक्षण नहीं दिया जा सकता, उन आंकड़ों के हिसाब से राज्य में जाट कैसे पिछड़े हैं। याची पक्ष की इन दलीलों के बाद जाटों ने अंतिम दौर में पक्ष रखते हुए कहा कि मंडल कमीशन में जाटों को भी आरक्षण के लिए योग्य माना गया था। ऐसे में जब उस समय जाट योग्य थे, तो अभी अयोग्य कैसे करार दिया जा सकता है।

कर्मियों और छात्रों के जातिगत आंकड़े रखना कैसे जायज
आरटीआई के माध्यम से हरियाणा के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों, शिक्षकों और कर्मियों के ब्यौरे के साथ ही अधिकारियों के जातिगत ब्यौरे को उपलब्ध करवाने पर हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे आंकड़े हम एकत्रित नहीं कर सकते तो ऐसे में इसे कहां तक जायज करार दिया जाए। कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो जाति विहीन समाज का सपना कैसे पूरा होगा। यह तो सीधे तौर पर इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के खिलाफ है।

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