कश्मीर पर पिटीशन साइन पर प्रोफेसरों की नौकरी गई?

अशोका यूनिवर्सिटी का दावा है कि उन्होंने अपने दो मैनेजर और एक प्रोफेसर को कश्मीर पर पीटिशन साइन करने के चलते यूनिवर्सिटी छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया। हालांकि यूनिवर्सिटी की फैकल्टी काउंसिल के दो ईमेल से कुछ और ही खुलासा हुआ है। दरअसल गणित के प्रोफेसर राजेंद्र नारायण, अकादमिक मामलों के उप प्रबंधक सौरव गौस्वामी और अकादमिक मामलों के कार्यक्रम प्रबंधक आदिल मुश्ताक शाह ने जुलाई 2016 में 85 छात्रों के साथ कश्मीर पर एक पेटिशन साइन की थी। इस याचिका में हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के मौत के बाद हुई हिंसा की निंदा की थी और जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग की थी। राजेंद्र नारायण ने “नैतिक कारणों” का हवाला देते हुए यूनिवर्सिटी के गणित विभाग से 15 दिसंबर को इस्तीफा दे दिया था। वहीं गौस्वामी और मुश्ताक शाह ने कैंपस में बोलने की आजादी के मुद्दे पर उपजे विवाद के बाद 7 अक्टूबर 2016 को इस्तीफा दे दिया था।

फैकल्टी काउंसिल के ईमेल से पता लगा कि यूनवर्सिटी के संचालक मंडल, जिसमें वाइस-काउंसलर रुद्रांग्शु मुख़र्जी भी शामिल थे; ने 1 अगस्त 2016 को नारायण को बर्खास्त करने को लेकर चर्चा की और 20 सितंबर को यह प्रत्साव फैकल्टी काउंसिल को भेजा। अक्टूबर 2016 में फैकल्टी काउंसिल में चार सदस्य – इतिहास की एसोसिएट प्रोफेसर अपर्णा वैदिक, गणित की सहायक प्रोफेसर माया सरन, राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर गिल्स वरनियर्स और भारतीय दर्शन के प्रोफेसर एलेक्स वाटसन थे। पिछले साल नवंबर में समीति का पुनर्गठन किया गया और नए सदस्य नियुक्त किए गए।

फैकल्टी काउंसिल ने 8 अक्टूबर को सभी टीचर्स को एक ईमेल भेजा जिसमें नारायण को हटाने की योजना पर रोक लगाने की बात कही गई। वहीं, 11 अक्टूबर 2016 को भेजे गए एक अन्य ईमेल में कहा गया कि गोस्वामी और शाह को कश्मीर याचिका में भाग लेने के कारण इस्तीफा देने के लिए कहा गया। इसमें यह भी कहा गया कि नारायण की प्रस्तावित बर्खास्तगी का फैसला भी कश्मीर याचिका के बाद कई जगह से पड़ने वाले दवाब के कारण लिया गया था। यह ईमेल यूनिवर्सिटी के उस दावे को खारिज करता है जिसमें कहा गया कि कर्मचारियों पर छोड़ने के लिए दबाव नहीं बनाया गया था।

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