अमृतसर पहुंचे लेखक गुलजार, कहा- आंखों को वीजा नहीं लगता, सपनों की सरहद नहीं होती

‘आंखों को वीजा नहीं लगता, सपनों की सरहद नहीं होती, बंद आंखों से चला जाता हूं सरहद पार मेहंदी हसन से मिलने…’। ये अल्फाज हैं शायर, लेखक, फिल्मकार और चिंतक गुलजार के, जिनका बचपन 1947 में हुए देश के बंटवारे के गलियारे से गुजरा। मुल्क बंटा तो घर छूटा, जानें गईं और भी ना जाने कौन-कौन सी तबाही।

-उस दर्द और बिछुडऩ को उन्होंने साहित्य का रूप दिया ताकि वह पीड़ा को सिर्फ पंजाबी ही नहीं बल्कि भारत और पाकिस्तान का हरेक नागरिक अपनी कहानी समझे।
-संपूरण सिंह से गुलजार बने इस शायर ने टाउन हाल स्थित पार्टीशन म्यूजियम में “गुफ्तगू’ प्रोग्राम के तहत बंटवारे और बचपन की टीसती यादों को सांझा किया।
-इस दौरान कई बार उनका गला भर आया तो ऑडियंस में बैठे लोगों की आंखें भी छलकीं।

बचपन की यादें हुईं ताजा
-“द आट्र्स एंड कल्चरल हेरिटेज ट्रस्ट’ की तरफ से करवाए गए इस आयोजन में पहुंचे गुलजार ने कहा कि इस पार्टीशन म्यूजियम को देख कर उनका बचपन की यादें ताजा हो गई हैं।
-उस दौरान जो जख्म मिले वह भुलाए नहीं जा सकते लेकिन आगे बढऩे के लिए भुलाना भी जरूरी था, क्योंकि टूटी और उजड़ी जिंदगी को बनाना था।
-हम आगे बढ़ते रहे मगर उजड़े घर और शहर अंदर बंद किए रहे। हमें शरणार्थी कहा गया लेकिन हम शरण लेने नहीं आए थे बल्कि अपने घर आए थे।
-उस दौर के लोगों ने जो कुर्बानी दी वह लासानी रही।
-किसी के लोग गए, किसी के घर उजड़े, कोई जड़ों से कट कर आया।
-मैं एक दर्द के साथ बड़ा हुआ। मैंने इधर से जाने वाले और उधर से आने वालों के दर्द देखे हैं।
-मैंने उनकी अधजली लाशें देखी हैं, जिनके साथ कंचे खेला करता था। वह कहते हैं कि जिए हैं हम पूरे-पूरे दर्द लेकर, जिए हैं हम पूरे कमाल से…।

बंटवारे पर नहीं बनी फिल्म
उनको इस बात का रंज है कि देश-दुनिया में हुए हरेक घटना-दुर्घटना पर फिल्में बनीं मगर 1947 के बंटवारे पर नहीं। अगर दोनों ही मुल्कों में इस तरह के प्रयास हुए होते तो शायद आज भारत और पाकिस्तान के बीच यह झगड़े और नफरत न होती। उन्होंने ट्रस्ट के लोगों को सलाह भी दी कि भारतीय पंजाब ही नहीं बल्कि पाकिस्तानी पंजाब से भी इसमें यादें और धरोहरें संजोई जाएं ताकि वहां के लोग भी उस दर्द को महसूस कर सकें।

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