बड़ी खबर, कंडक्टरों की भर्ती में हुआ था गड़बड़झाला, 5 अफसरों पर चलेगा केस

शिमला

साल 2003-04 में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हिमाचल पथ परिवहन निगम में हुई 378 ट्रांसपोर्ट मल्टीपर्पज असिस्टेंट (कंडक्टर) की भर्ती में तत्कालीन एमडी समेत पांच अधिकारियों पर अदालत ने एफआईआर दर्ज करने के आदेश जारी किए हैं। ज्यूडिशियल मैजिस्टे्रट नेहा शर्मा ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद यह पाया की यह मामला आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा व किसी बड़े घोटालों का प्रतीत हो रहा है जिस कारण मामले की निष्पक्ष जांच के लिए प्राथमिकी का दर्ज किया जाना अति आवश्यक है। अदालत ने यह आदेश प्रार्थी अजय कुमार व जय कुमार द्वारा दायर आवेदन की सुनवाई के पश्चात पारित किए।

31 मार्च, 2011 को हुआ था इस मामले में का खुलासा
प्रार्थी ने एच.आर.टी.सी. में हुए फर्जी वारे का खुलासा करने के मकसद में सतर्कता विभाग में शिकायत दर्ज की थी जिसके उपरांत सतर्कता विभाग के डी.एस.पी. विरेंद्र कालिया को जांच का जिम्मा सौंपा गया। इस दौरान विभाग में इस मामले से जुड़े तथ्यों की जांच करने पर सतर्कता विभाग ने भर्ती प्रक्रिया के दौरान भर्ती प्रक्रिया अनियमितताओं की बात सामने आई और यह पाया की कंडक्टर भर्ती मामले में विभाग के आलाधिकारियों की मिलीभगत से अनियमितताएं बरती गई हैं। जिसके बाद सतर्कता विभाग ने एक रिपोर्ट तैयार की जिसने 31 मार्च, 2011 को इस मामले में की गई धांधली का खुलासा हुआ था। यही नहीं जांच अधिकारी ने मामले में तत्कालीन एच.आर.टी.सी. के अधिकारियों के साथ आई.पी.सी. की धारा 420 व 120 की धाराओं के तहत आपराधिक मामला दर्ज किए जाने की सिफारिश भी की थी लेकिन भारी राजनीतिक दबाव के चलते इस मामले पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी थी।

300 लोगों को भर्ती किए जाने के लिए मंगवाए थे आवेदन
सतर्कता विभाग ने जांच के दौरान यह भी पाया था कि विभाग ने डिवीजन स्तर पर परीक्षा में बैठे परीक्षार्थियों की न तो कोई मैरिट लिस्ट तैयार की गई थी। यही नहीं तैयार की गई सूची में भी कई जगह छेड़छाड़ की गई थी। कई जगह ओवर राइटिंग भी थी जांच में यह भी पाया गया की 147 कंडक्टर परीक्षार्थी ऐसे थे जिन्होंने लिखित परीक्षा में 90 प्रतिशत अंक प्राप्त किए लेकिन अपने चहेतों की भर्ती के चक्कर में विभाग के आलाधिकारियों ने साक्षात्कार के दौरान उन्हें 20 से 40 अंक कम दिए और जिन चहेते परीक्षार्थियों के लिखित परीक्षा में कम अंक थे उन्हें ज्यादा अंक देकर उतीर्ण किया गया। यही नहीं विभाग ने कंडक्टर भर्ती के लिए दिए विज्ञापन में 300 लोगों को भर्ती किए जाने के लिए आवेदन मंगवाए थे लेकिन अपने चहेतों को फायदा देने के लिए उन की जगह 378 उम्मीदवारों का चयन किया गया जिसके लिए कोई विज्ञापन प्रकाशित नहीं किया गया।

प्रदेश का सबसे बड़ा घोटाला
निगम ने अकेले नगरोट बगवां डिवीजन से 90, धर्मशाला डिवीजन से 64, रोहड़ू डिवीजन से 50 परिचालकों का चयन किया गया था जबकि अन्य डिवीजन से नामात्र के ही उम्मीदवारों का चयन हुआ। जबकि चयनित उम्मीदवारों ने लिखित परीक्षा में ही केवल 50 प्रतिशत अंक लिए थे उन्हें टी.एम.सी. भर्ती कर दिया गया और योग्य उम्मीदवारों को दरकिनार किया गया। इस इंटरव्यू में प्रदेश के 40 हजार युवाओं ने एच.आर.टी.सी. में परिचालक का इंटरव्यू दिया था इसमें से 14,107 अभ्यर्थी लिखित परीक्षा में उतीर्ण हुए। इस मामले की पैरवी उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुरेश कुमार ठाकुर ने की। इस मामले को लेकर परिवहन मजदूर संघ के अध्यक्ष शंकर सिंह ने भी उस समय इस भर्ती को प्रदेश का सबसे बड़ा घोटाला बताते हुए सी.बी.आई. से जांच किए जाने की मांग की थी।

बेरोजगार परिचालक संघ ने भी उठाया था मामला
इस मामले को लेकर वर्ष 2004 में हिमाचल बेरोजगार परिचालक संघ ने भर्ती में धांधलियां किए जाने को लेकर इसकी जांच सी.बी.आई. से करवाने की मांग की थी और कहा था कि इस फर्जी भर्ती घोटाले में 14 हजार युवाओं से धोखाधड़ी के आरोप लगाए थे। जिसके बाद इस मामले में सतर्कता विभाग को जांच का जिम्मा सौंपा गया था।

378 परिचालकों की नौकरी पर संकट
परिवहन निगम के 378 परिचालकों की नौकरी पर संकट गहरा गया है। सेंशन कोर्ट की ओर से शुक्रवार को जारी निर्देशों के बाद परिवहन निगम में हड़कंप मचा गया है। कोर्ट ने शिमला पुलिस को मामले में संलिप्त अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को कहा है। परिवहन निगम को भी इसकी मौखिक सूचना मिल चुकी है। परिवहन निगम पहले ही परिचालकों की कमी से जूझ रहा है। अब अगर 378 परिचालकों को बाहर का रास्ता दिखाया जाता है तो परिवहन निगम की और मुश्किलें बढ़ेगी। वर्तमान परिवहन निगम में 2000 परिचालक है जबकि बसों की संख्या 3200 है। इन दो हजार परिचालकों में 1600 के करीब नियमित परिचालक जबकि अन्य अनुबंध पर तैनात है।

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