पढ़ें, हाईकोर्ट ने क्यों लगाई दिल्ली सरकार को फटकार

नई दिल्ली

नर्सरी दाखिले पर हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस मनमोहन ने सख्त लहजे में कहा कि वह तीन साल से लगातार स्कूल और सरकार के बीच दाखिले को लेकर रस्साकशी से परेशान हैं। हर बार सरकार ऐसे नियम लाती ही क्यों है, जो दाखिला प्रक्रिया में परेशानी उत्पन्न करते हैं।
हाईकोर्ट ने नर्सरी एडमिशन को लेकर शहरी विकास मंत्रालय और मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट जानना चाहता है कि डीडीए ने प्राइवेट स्कूलों को किस आधार पर जमीन दी थी और उनमें से किन शर्तों का पालन जरूरी है या अनिवार्य है। डीडीए लैंड पर बने स्कूलों के लिए एजुकेशन पाॅलिसी क्या है? क्या सभी स्कूलों के लिए नर्सरी एडमिशन करने के लिए नेबरहुड
क्राइटेरिया का पालन करना जरूरी है?

कुछ पेरेंटस और माइनोरिटी स्कूल की ओर से अधिवक्ता खगेश झा ने याचिका दायर कर नर्सरी दाखिले की सुनवाई एकल पीठ की बजाए संयुक्त पीठ में करने को कहा था, जिसे न्यायमूर्ति संजीव खन्ना एवं न्यायमूर्ति चंद्रशेखर की पीठ ने खारिज कर दिया और कहा कि पहले अपनी अपील एकल पीठ में लेकर जाओ। अब जस्टिस मनमोहन की कोर्ट में ही नर्सरी दाखिल की अगली सुनवाई शुक्रवार को होगी।

यह है नियम और परेशानी
पब्लिक स्कूलों की लीगल संस्था एक्शन कमेटी के उपाध्यक्ष आरसी जैन ने कहा कि कमेटी की ओर से अधिवक्ता सुनील गुप्ता और कमल गुप्ता ने कोर्ट में तर्क रखा था कि सरकार ने स्कूलों पर यह नियम थोपा है कि एक किलोमीटर के दायरे में रहने वाले बच्चों का दाखिले करें। एक किलोमीटर के दायरे में अगर 4 स्कूल हैं और 4 की फीस 5 हजार है। ऐसे में तो अभिभावक के पास विकल्प ही नहीं बचा कि वह थोड़ी दूर जाकर सस्ते और अच्छे स्कूल में बच्चे का दाखिला करा सकें।

डीडीए साफ कर चुका है कि शिक्षा निदेशालय द्वारा ही स्पॉन्सर लेटर में नियम शर्तें बनाई गई हैं। डीडीए द्वारा भूमि आवंटन के समय कोई नियम शर्त नहीं थोपी गई। इसके अलावा एजूकेशन एक्ट में साफ उल्लेख है कि दाखिले और नियम शर्तें तय करने का अधिकार स्कूल प्रबंधन का है। फिर बार-बार शिक्षा निदेशालय और दिल्ली सरकार नए-नए नियम थोपकर दाखिला प्रक्रिया और कोर्ट के समय की बर्बादी करते हैं।

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