भारत की NSG सदस्यता में चीन सबसे बड़ा ‘अवरोधक”: अमेरिका

वाशिंगटन

न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (NSG) में भारत की एंट्री की तरफदारी कर रहे अमेरिका को खरी खोटी सुनाई है. चीन की ओर से कहा गया है कि NSG में मेंबरशिप ओबामा का फेयरवेल गिफ्ट नहीं है जो आसानी से दे दिया जाए. बता दें कि बराक ओबामा कुछ दिनों में राष्ट्रपति पद का कार्यकाल पूरा करने वाले हैं, इससे पहले उनकी टीम ने कोशिश की थी कि भारत को इस ग्रुप में एंट्री मिल जाए. हालांकि, चीन कई बार अड़ंगा लगा चुका है.

चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने कहा, ”एनएसजी मेंबरशिप दो देशों के लिए फेयरवेल गिफ्ट जैसा नहीं है जो जिसका आपस में लेन देन कर लें.” साथ ही चीन ने दोहराया कि नॉन-एनपीटी देशों की इस ग्रुप में एंट्री को लेकर चीन अपने स्टैंड से फिलहाल पीछे नहीं हट रहा है. चीन का कहना है कि भारत के आवेदन के बारे में सोचने से पहले चीन को नॉन-एनपीटी देशों के बारे में एक सामान्य रवैया अपनाना होगा.

एनएसजी परमाणु से संबंधित अहम मुद्दों को देखता है और इसके 48 सदस्यों को परमाणु प्रौद्योगिकी के व्यापार एवं उसके निर्यात की इजाजत होती है. एनएसजी सर्वसम्मति के सिद्धांत के तहत काम करता है और भारत के खिलाफ एक देश का भी वोट भारत की दावेदारी को नुकसान पहुंचा सकता है. चीन एनएसजी में भारत की एंट्री का विरोध कर रहा है. उसका कहना है कि बिना परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर किए किसी भी देश की इस समूह में एंट्री नहीं हो सकती. एनएसजी का गठन 1974 में इंडिया के पहले परमाणु परीक्षण के बाद हुआ था. इसका लक्ष्य था कि दुनिया में भर में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोका जाए.

चीन और पाकिस्तान की लाख कोशि‍शों के बावजूद अमेरिका भारत को इस ग्रुप में शामिल कराने में लगा है. कुछ महीने पहल अमेरिका ने न्यूजीलैंड भारत को समर्थन के लिए राजी कर लिया था. ब्रिटेन ने भी भारत को समर्थन का भरोसा दिया है. अमेरिका ने एनएसजी में शामिल बाकी सदस्यों से भी इस विशिष्ट समूह में भारत की सदस्यता के लिए समर्थन करने का अनुरोध किया है. हालांकि, चीन कई बार भारत का रास्ता रोक चुका है.

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