जलीकट्टू पर अगले हफ्ते आ सकता है फैसला

तमिलनाडु में आज पोंगल, प्रतिबंध के बावजूद जल्लीकट्टू का आयोजन

दक्षिण भारत में पोंगल के अवसर पर सांड़ों के दौड़ से जुड़े खेल जल्लीकट्टू मामले पर लोगों को सुप्रीम कोर्ट से निराशा हाथ लगी. सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध का उल्लंघन करते हुए युवाओं के एक समूह ने जल्लीकट्टू का आयोजन किया. पोंगल के दौरान जल्लीकट्टू को इजाजत देने के लिए राज्य भर में विरोध-प्रदर्शनों के बीच राज्य के लोग किसी अनुमति का इंतजार करने के मूड में नहीं हैं. शनिवार को भी खई जगह इसके आयोजन किए जाने की तैयारी है.

पिछले कुछ दिनों से जल्लीकट्टू पर लगातार विवाद बना हुआ है. तमिलनाडु के राजनीतिक दल और नेता लगातार केंद्र से इस संबंध में अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं. जबकि पुशओं के अधिकार से जुड़े कार्यकर्ता अध्यादेश लाने के किसी भी प्रयास के खिलाफ हैं.

केंद्रीय मंत्री पोन राधाकृष्णन ने जल्लीकट्टू लागू नहीं करवा पाने के लिए माफी मांगी. उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से अध्यादेश केवल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जारी किया जा सकता है. राधाकृष्णन ने कहा कि वो अभी भी चाहते हैं कि इस पर से प्रतिबंध हटे. किसानों के संकट के कारण मैं इस साल पोंगल का जश्न मना नहीं मना रहा हूं. किसानों के कल्याण के लिए अपना वेतन और मासिक भत्ता दान कर रहा हूं.

सुप्रीम कोर्ट ने जलीकट्टू मामले पर जल्दी नया आदेश देने की अर्जी को ठुकरा दिया है. पोंगल त्योहार इस शनिवार को ही है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शनिवार से पहले इस मामले में बेंच को आदेश देने के लिए कहना अनुचित है.

क्या है जल्लीकट्टू
तमिलनाडु में मकर संक्रांति का पर्व पोंगल के रूप में मनाया जाता है. पोंगल के मौके पर एक खास बैल दौड़ का आयोजन किया जाता है. पोंगल के त्योहार में मुख्य रूप से बैल की पूजा की जाती है क्योंकि बैल के माध्यम से किसान अपनी जमीन जोतता है. इसी के चलते बैल दौड़ का आयोजन किया जाता है. इस समारोह को जल्लीकट्टू प्रथा नाम से जानते हैं.

आंकड़ों के अनुसार 2010 से 2014 के बीच जल्लीकट्टू खेलते हुए 17 लोगों की जान गई थी और 1,100 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे. वहीं पिछले 20 सालों में जल्लीकट्टू की वजह से मरने वालों की संख्या 200 से भी ज्यादा थी. इस वजह से साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रिवेंशन ऑफ क्रूअलटी टू एनिमल एक्ट के तहत इस खेल को बैन कर दिया था.

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