1984 सिख विरोधी दंगा: कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को कोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

दिल्ली

दिल्ली कैंट में वर्ष 1984 में हुए सिख विरोधी दंगे के मामले में आरोपी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सज्जन कुमार को कोर्ट से राहत मिल गई है. द्वारका कोर्ट ने कांग्रेस नेता सज्जन कुमार की अग्रिम जमानत याचिका मंजूर कर ली. इस मामले में कोर्ट ने मंगलवार को फैसला सुरक्षित कर लिया था. इस केस में सज्जन कुमार के अलावा पांच अन्य लोग भी आरोपी हैं.

कोर्ट ने वरिष्ठ नेता सज्जन कुमार से एक लाख रुपये का निजी मुचलका भी भरवाया. अदालत ने जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करने की शर्त पर सज्जन कुमार को जमानत दे दी. कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि बिना अदालत की इजाजत के सज्जन कुमार देश से बाहर नहीं जाएंगे.

1884 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में सिख विरोधी दंगे फैले थे. इस दौरान दिल्ली कैंट के राजनगर में पांच सिखों केहर सिंह, गुरप्रीत सिंह, रघुविंदर सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और कुलदीप सिंह की हत्या कर दी गई थी. जिसमें सज्जन कुमार समेत पांच कांग्रेसी नेताओं का नाम आया था.

उस दंगे में मारे गए केहर सिंह की पत्नी जगदीश कौर ने इस मामले की शिकायत की थी. मृतक के भाई जगशेर सिंह इस मामले में अहम गवाह थे. सीबीआई ने 2005 में जगदीश कौर की शिकायत और न्यायमूर्ति जीटी नानावटी आयोग की सिफारिश पर दिल्ली कैंट मामले में सज्जन कुमार कैप्टन भागमल, पूर्व विधायक महेंद्र यादव, गिरधारी लाल, कृष्ण खोखर और पूर्व पार्षद बलवंत खोखर के खिलाफ मामला दर्ज किया था.

सीबीआई ने सभी आरोपियों के खिलाफ 13 जनवरी 2010 को आरोप पत्र दाखिल किया था. इसी साल सितंबर माह में दिल्ली हाई कोर्ट ने 1984 के सिख दंगों से जुड़े केस में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार की ओर से दी गई उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने एक केस को दूसरी बेंच में ट्रांसफर करने की अपील की थी. कोर्ट की बेंच ने कहा था कि याचिका आधारहीन, दुर्भावनापूर्ण और गलत है. जिसमें कोई तथ्य नजर नहीं आता है.

हाईकोर्ट की बेंच ने कहा था कि यह कानून का दुरुपयोग है. इस मामले के बाद जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस पी.एस. तेजी की बेंच ने सज्जन कुमार और दूसरे आरोपियों की उस याचिका को भी खारिज कर दिया था, जिसमें मामले की सुनवाई कर रही बेंच के एक सदस्य पर पूर्वाग्रह से ग्रसित होने का आरोप लगाया गया था.

उस वक्त बेंच ने कहा था कि इन याचिकाओं में दी गई दलीलें कोर्ट की अवमानना की तरह है, लेकिन वह और कोई कार्रवाई शुरू नहीं कर रहा है ताकि मामले में और देरी नहीं हो.

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