'भारतीय और पाश्चात्य ज्ञान परम्पराओं' पर प्राख्यात शिक्षाविदों ने रखे अपने विचार

‘भारतीय और पाश्चात्य ज्ञान परम्पराओं’ पर प्राख्यात शिक्षाविदों ने रखे अपने विचार

दिल्ली

दिल्ली विश्वविद्यालय में 25 नवंबर से शिक्षकों के लिए ओरिएंटेशन प्रोग्राम की शुरुआत की गई. कार्यक्रम का उद्घाटन हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ए. डी. वाजपेयी ने किया. इस दौरान उन्होंने कहा कि ‘एकात्म मानववाद की अवधारणा पं० दीनदयाल उपाध्याय जी का बड़ा महत्वपूर्ण देन है. उन्होंने महात्मा गाँधी के योगदान की भी चर्चा की.’

कार्यक्रम में खास तौर पर राज्यसभा के पूर्व सदस्य डॉ. महेश शर्मा ने शिरकत की. इस दौरान उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित शिक्षकों को संबोधित किया. उन्होंने कहा, पूर्वजों के कारण हम यहाँ एकत्रित हैं. यह समय विश्लेषण का है. यह संक्रांति काल है, अभी भारत ने फिर से सोचना शुरू किया है इसलिए दिशा दुरुस्त रहेगी. इसके लिए हम आश्वस्त हैं. पाश्चात्य लेखकों को पढ़कर जो राजनीति का ज्ञान प्राप्त किया गया है वह अधूरा ज्ञान है. अरस्तु को राजनीति विज्ञान का जनक माना जाता है पर चाणक्य को भूलकर राजनीति शास्त्र नहीं बनाया जा सकता. चाणक्य अगर परंपरा में हैं तो सिर्फ अरस्तु को महत्व क्यों? राजनीति का ज्ञान अरस्तु के साथ-साथ चाणक्य ने भी दिया यह भी समझने की आवश्यकता है.

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कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो० गीता सिंह, निदेशक, सी० पी० डी० एच० ई०, UGC-HRDC, दिल्ली विश्वविद्यालय ने की. उन्होंने कार्यक्रम की शुरुआत में प्रतिभागियों को संबोधित किया और अतिथियों का स्वागत किया. उन्होंने कहा कि पं० दीनदयाल उपाध्याय जी जैसे महान मनीषी ने वर्तमान देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप भारत के परिवेश को दृष्टि में रखकर भारत की एकात्म चेतना की रुपरेखा प्रस्तुत की.

भोजनोपरांत प्रो० शंभूशिवानन्द नव-मानववाद की शैक्षणिक अवधारणा, पर्यावरण और मानव के सामंजस्य की बात की और वर्तमान समय में इसकी उपयोगिता और प्रासंगिकता के बारे में बताया. प्रो० रमेश भारद्वाज जी ने भारतीय सभ्यता के इतिहास की बात की.

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