श्री गुरुनानक देव जयंती: जानें सिखों के पहले गुरु ने कैसे सिखाई जीनव जीने की कला

श्री गुरुनानक देव जयंती: जानें सिखों के पहले गुरु ने कैसे सिखाई जीवन जीने की कला

सोमवार को देशभर में गुरु पर्व मनाया जा रहा है. यह सिख धर्म के संस्थापक और प्रथम गुरु नानक देव जी के जन्म के उपलक्ष्य में मनाया जाता है. इसे गुरु नानक जयंती या गुरु नानक प्रकाशोत्सव के नाम से भी जाना जाता है.

गुरु नानक जी का जन्म 547 साल पहले 15 अप्रैल, 1469 को तलवंडी में हुआ, जिसे अब ननकाना साहिब नाम से जाना जाता है. हम आपको बता रहे हैं गुरु नानक जी के वह 10 उपदेश, जो सिखाएंगे आपको जीवन जीने का सही रास्ता.

1. एक ओंकार सतिनाम, करता पुरखु निरभऊ।
निरबैर, अकाल मूरति, अजूनी, सैभं गुर प्रसादि ।।
अर्थ – ईश्वर एक है. वह सभी जगह मौजूद है. हम सबका “पिता” वही है, इसलिए सबके साथ प्रेमपूर्वक रहना चाहिए.

2. नीच अंदर नीच जात, नानक तिन के संग, साथ वढ्डयां, सेऊ क्या रीसै।
अर्थ – नीच जाति में भी जो सबसे ज्यादा नीच है, नानक उसके साथ है, बड़े लोगों के साथ मेरा क्या काम.

3. ब्राह्मण, खत्री, सुद, वैश-उपदेश चाऊ वरणों को सांझा।
अर्थ – गुरुबाणी का उपदेश ब्राह्मणों, क्षत्रीय, शूद्र और वैश्य सभी के लिए एक जैसा है.

4. धनु धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई।
तन छूटै कुछ संग न चालै, कहा ताहि लपटाई॥
अर्थ – धन को जेब तक ही सीमित रखना चाहिए. उसे अपने हृदय में स्थान नहीं बनाने देना चाहिए. तुम्हारा घन और यहां तक की तुम्हारा शरीर, सब यहीं छूट जाता है.

5. हरि बिनु तेरो को न सहाई।
काकी मात-पिता सुत बनिता, को काहू को भाई॥
अर्थ – हरि के बिना किसी का सहारा नहीं होता. काकी, माता-पिता, पुत्र सब तू है कोई और नहीं.

6. दीन दयाल सदा दु:ख-भंजन, ता सिउ रुचि न बढाई।
नानक कहत जगत सभ मिथिआ, ज्यों सुपना रैनाई॥
अर्थ – इस संसार में सब झूठ है. जो सपना तुम देख रहे हो वह तुम्हे अच्छा लगता है. दुनिया के संकट प्रभु की भक्ति से दूर होते हैं. तुम उसी में अपना ध्यान लगाओ.

7. मन मूरख अजहूँ नहिं समुझत, सिख दै हारयो नीत।
नानक भव-जल-पार परै जो गावै प्रभु के गीत॥
अर्थ – मन बहुत भावुक और बेवकूफ है जो समझता ही नहीं. रोज उसे समझा-समझा के हार गए हैं कि इस भव सागर से प्रभु अथवा गुरु ही पर लगाते हैं और वे उन्ही के साथ हैं जो प्रभु भक्ति में रमे हुए हैं.

8. मेरो मेरो सभी कहत हैं, हित सों बाध्यौ चीत।
अंतकाल संगी नहिं कोऊ, यह अचरज की रीत॥
अर्थ – इस जगत में सब वस्तुओं को, रिश्तों को मेरा है-मेरा हैं करते रहते हैं लेकिन मृत्यु के समय सब कुछ यही रह जाता हैं कुछ भी साथ नहीं जाता. यह सत्य आश्चर्यजनक है पर यही सत्य है.

9. तनाव मुक्त रहकर अपने कर्म को निरंतर करते रहना चाहिए तथा सदैव प्रसन्न भी रहना चाहिए।

10. कभी भी किसी का हक नहीं छीनना चाहिए बल्कि मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए।

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