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JNU चुनाव: एबीवीपी को मिली अब तक की सबसे बड़ी हार

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव 2016 में एबीवीपी को अब तक की सबसे बड़ी हार मिली है। सेंट्रल पैनल से लेकर स्कूल काउंसलर्स पद पर एबीवीपी को जहां सीट नहीं मिली, वहीं वोट बैंक भी कम हो गया। सबसे बड़ी हार तो स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज में मिली है, जहां एबीवीपी एक भी सीट नहीं निकाल पाई। जबकि यहां छात्रों से लेकर शिक्षक एबीवीपी या संघ के समर्थक हैं। खास बात यह रही कि हार के साथ एबीवीपी के चार काउंसलर्स ने दामन छोड़ने का संकेत देते हुए न्यूट्रल (तटस्थ) रहने का संकेत दे दिया। केंद्र में मोदी के आते ही चौदह साल के बाद एबीवीपी ने बड़े जोश के साथ लाल दुर्ग का अभेद किला तोड़ा था। एबीवीपी को छात्रों का साथ भी मिल रहा था।

हालांकि नौ फरवरी को देश विरोधी घटना में लेफ्ट के छात्रों का नाम आने के बाद छात्र नाखुश थे और एबीवीपी के साथ खड़े थे। हालांकि इसी बीच संघ और बीजेपी नेताओं के बयानों ने छात्रों में विरोध की आवाज उठा दी, जिसमें बीजेपी नेता ने जेएनयू में कंडोम व शराब की बोतल मिलने पर सार्वजनिक बयान दिया था कि जेएनयू में वेश्या रहती हैं। इस बयान के बाद जेएनयू में उबाल आया और विश्वविद्यालय को बदनाम करने के विरोध में एक हो गए। इस बयान के बाद जेएनयू के छात्रों को अन्य विश्वविद्यालयों में दाखिले से लेकर लोगों ने किराए पर घर देना भी बंद कर दिया था। वहीं, छात्रसंघ चुनाव से ठीक पहले आइसा के सदस्य पर रेप का आरोप लगते ही एक बार फिर छात्र एबीवीपी के साथ हो रहे थे। इसके अलावा चार सालों से छात्रसंघ पर आइसा का कब्जा था, लेकिन हॉस्टल, स्कॉलरशिप, महिला सुरक्षा, ट्रांसपोर्ट आदि की दिक्कत दूर न होने पर मतदाता आइसा से नाराज थे। लेफ्ट के अलग-अलग संगठनों के चुनाव लड़ने से एबीवीपी को लाभ हो सकता था, इसलिए लेफ्ट यूनिटी बनीं और वोट बैंक में सेंध पर रोक लगाई। हालांकि आखिरी में बापसा भी लेफ्ट को चुनौती देने में कामयाब रहा।एबीवीपी को इससे पहले बड़ी हार वर्ष 2012 में मिली थी। जब आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुचेता ने एबीवीपी के गढ़ कहे जाने वाले स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज में स्कूल काउंसलर पद पर जीत हासिल कर पहली बार लेफ्ट की एंट्री करवाई थी।

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