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नागा उग्रवादियों का दावा, म्यांमार ऑपरेशन में सेना के 6 कमांडो हुए थे शहीद

नागा उग्रवादियों के खिलाफ जून 2015 में भारतीय सेना के कमांडो दस्ते के म्यांमार ऑपरेशन को लेकर नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड के एसएस खापलांग धडे़ (एनएससीएन-के) ने दावा किया है कि उस ऑपरेशन में सेना के 5 से 6 कमांडो शहीद हुए थे।

एनएससीएन-के ने हिन्दुस्तान टाइम्स को भेजे एक ईमेल में कमांडो के मारे जाने का दावा किया है। हालांकि सेना इस कार्रवाई में किसी भी कमांडो के शहीद होने की पुष्टि नहीं की है।

40 मिनट में अंजाम दिया गया पूरा ऑपरेशन
भारतीय सेना के 30 कमांडो के एक दल ने म्यांमार सीमा के भीतर रात के अंधियारे में लक्ष्य पर किये गये सटीक हमले में महज 40 मिनट में अपने काम को अंजाम दे दिया और इसमें 38 नगा विद्रोही मारे गए एवं सात घायल हो गए थे। हालांकि बाद में सेना ने म्यांमार में दाखिले होने की बात से इनकार कर दिया था।

इस पूरे मामले से संबद्ध रहे सूत्रों ने बताया कि चार जून 2015 को मणिपुर के चंदेल इलाके में नगा उग्रवादियों द्वारा घात लगाकर किए गए हमले में 18 सैनिकों के शहीद होने के कुछ ही घंटे बाद तुरंत पीछा कर कार्रवाई करने का निर्णय किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बांग्लादेश से लौटकर आने के कुछ ही समय बाद सात जून की रात को उनसे अनुमति हासिल की गई।

सुरक्षा सू़त्रों ने बताया कि 21 पारा के इन कमांडो को म्यांमार सीमा से लगने वाले भारतीय क्षेत्र में धुव्र हेलीकाप्टरों से रात करीब तीन बजे उतारा गया। कमांडो असाल्ट राइफल्स, राकेट लांचर, ग्रेनेड और रात में देख सकने में सक्षम उपकरणों से लैस थे।

सेना के विशेष बल के कमांडो विभाजित होने के बाद एनएसीएन (के) एवं केवाईकेएल द्वारा संचालित दो शिविरों की ओर बढ़े। माना जाता है कि ये दोनों समूह ही चार जून को घात लगाकर किए गए भीषण हमले के लिए जिम्मेदार हैं जिनमें 18 सैनिक मारे गये एवं 11 अन्य घायल हो गये।

शिविर तक पहुंचने से पहले इन कमांडो को जंगलों में करीब पांच किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी पड़ी।

सुरक्षा सूत्रों ने बताया कि दोनों दलों में से प्रत्येक को दो उप समूहों में विभाजित किया गया था। इनमें से एक समूह को सीधे हमले की जिम्मेदारी दी गई थी जबकि दूसरे ने बाहरी घेरा बनाया ताकि किसी भी विद्रोही को बचकर भाग निकलने से रोका जा सके।

वास्तविक अभियान (शिविर पर हमला करना और नष्ट करना) 40 मिनट चला। कमांडो ने मुठभेड़ में न केवल शिविर में मौजूद लोगों को मार गिराया गया बल्कि रॉकेट लांचर का इस्तेमाल भी किया गया और एक शिविर में आग लगा दी गयी।

सूत्रों ने ग्राउंड रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि हमले में 38 उग्रवादी मारे गए जबकि सात अन्य घायल हो गये। सूत्रों ने बताया कि अभियान पर नजर रखने के लिए थर्मल इमेजरी का भी इस्तेमाल किया गया। उन्होंने कहा कि म्यांमार के अधिकारियों से भी तालमेल रखा गया था।

वायु सेना ने एमआई 17 हेलीकाप्टरों को कर रखा था तैयार
भारतीय वायु सेना के एमआई 17 हेलीकाप्टरों को तैयार रखा गया था ताकि कुछ भी गड़बड़ होने की स्थिति में वे कमांडो को वहां से निकाल सकें। सू़त्रों ने बताया कि यह अभियान विशिष्ट एवं बेहद सटीक खुफिया सूचनाओं के आधार पर अंजाम दिया गया। इस अभियान का अधीक्षण दीमापुर स्थित 3 कोर के कमांडर लेफ्टीनेंट जनरल विपिन रावत कर रहे थे।

अभियान के लिए अपने ब्रिटेन दौरे को टाल देने वाले सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह सुहाग सेना मुख्यालय से समन्वय कर रहे थे। उग्रवादियों का सफाया करने का यह निर्णय चार जून को हुए हमले के कुछ ही घंटों बाद एक बैठक में किया गया। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इस बैठक की अध्यक्षता की और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल, जनरल सुभाग एवं अन्य उसमें मौजूद थे।

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