वे लोग जिनके लिए सुलगने लगा कश्मीर

कश्मीर में बुरहान वानी की मौत के बाद हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं. वानी के बारे में कहा जा रहा है कि वह 15 साल की उम्र में ही हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़ गया था.

उसने अब तक कोई अपराधिक काम को अंजाम तो नहीं दिया था, लेकिन कश्मीर में चरमपंथियों के बीच उसकी छवि हीरो जैसी बन गई थी.

2010 में चरमपंथी हिंसा में कश्मीर में 100 से ज़्यादा युवा मारे गए थे. इस हिंसा का असर भी बुरहान वानी पर हुआ, जिनकी उम्र उस वक्त 16 साल की थी.

वह सोशल मीडिया के जरिए लोगों के बीच अपने संदेश प्रभावी ढंग से पहुंचाता था और माना जा रहा है कि उसकी देखा देखी मे कश्मीर के ढेरों युवाओं ने हथियार उठा लिए थे. इसलिए वह भारतीय सुरक्षा बलों की नजर में मोस्ट वांटेड था.

भारतीय मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी कहा जा रहा है कि उसकी रंगीन मिजाजी के चलते ही उसकी एक पूर्व प्रेमिका ने पुलिस को उसके अनंतनाग में होने का सुराग दे दिया था, जिसके बाद पुलिस ने उसे मुठभेड़ में मार गिराया.

कश्मीर घाटी के एक प्रिंसिपल के बेटे का चरमपंथी हीरो के तौर पर उभरना दर्शाता है कि कश्मीर अब भी सुलग रहा है और जब जब उसे अपना हीरो मिलता है, वह अचानक से जलने लगता है और हालात नियंत्रण के बाहर हो जाते हैं.

कश्मीर में ऐसे विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत का इतिहास काफी पुराना है. जम्मू कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी के मुताबिक, “1953 में शेख मुहम्मद अब्दुल्ला जो कि यहां के प्रधानमंत्री हुआ करते थे, उन्हें ग़ैरकानूनी तरीके से पद से हटा दिया गया, उन्हें जेल भेजा गया तो उस पर कश्मीर में काफ़ी बवाल हुआ.

वे आगे बताते हैं, “हम अपने बुज़ुर्गों से सुनते थे कि उसके बाद कई महीनों तक लोग सड़कों पर थे, बहुत प्रदर्शन हुए और लोग भी मरे. उसके बाद शेख साहब ने एक मोर्चा बनाया जो 22 साल तक चला. लोग बार-बार सड़कों पर आते थे और प्रदर्शन करते थे.”

इसके बाद ऐसे स्थिति तब देखने को मिली थी, जब मक़बूल बट को फांसी दी गई थी. कश्मीर की आजादी के लिए संघर्ष की शुरुआत करने वालों में शुमार और जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के संस्थापक सदस्यों में एक मक़बूल बट को एक सीआईडी इंस्पेक्टर की हत्या के जुर्म में तिहाड़ जेल में 11 फरवरी, 1984 को फांसी दी गई थी.

बट के शव को तिहाड़ में ही दफ़नाया गया. कश्मीर की जनता ने बट के शव की मांग के साथ काफी प्रदर्शन किया था. इतना ही नहीं श्रीनगर के शहीद कब्रिस्तान में लोगों ने मक़बूल बट के लिए खाली कब्र भी बनवाई.

18 फरवरी, 1938 को जन्मे मक़बूल बट कश्मीर यूनिवर्सिटी से बीए करने के बाद पेशावर यूनिवर्सिटी से एमए कर चुके थे. इसके बाद उन्होंने शिक्षक के तौर पर भी काम किया और पत्रकार के तौर पर भी. लेकिन बाद में वे अलगाववादी बन गए थे.

मक़बूल बट के बाद 1987 के चुनाव के दौरान एक बार फिर से भारी विरोध प्रदर्शन देखने को मिला. इस चुनाव में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट की टिकट पर मोहम्मद यूसुफ़ शाह ने चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया.

श्रीनगर के अमीरकादल विधानसभा सीट से माना जा रहा था कि यूसुफ़ शाह चुनाव जीत रहे हैं, लेकिन जब नतीजे घोषित किए गए तो नेशनल कांफ्रेंस के गुलाम मोहिउद्दीन शाह विजयी घोषित किए गए. बताया गया कि चुनाव नतीजों में जमकर धांधली की गई. बड़े पैमाने पर बूथ कब्जे की घटना हुई और पुलिस ने आम जनता की शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया.

यूसुफ शाह ने चुनाव नतीजों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, जिसके बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया. 1989 में रिहा होने के बाद वे हिज़बुल मुज़ाहिदीन में शामिल हो गए. आज वही यूसुफ सैयद सलाउद्दीन के नाम से कश्मीर में चरमपंथी संगठनों का नेतृत्व संभाल रहे हैं. सलाउद्दीन पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से हिज़्बुल की कमान भी संभाल रहे हैं. भारत की नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी की लिस्ट में मोस्ट वांटेड अपराधी बने हुए हैं.

जम्मू कश्मीर की सियासत पर किताब लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं, “इस चुनाव के दौरान जिस तरह से नतीजे बदले गए, बूथ कब्ज़ा किया गया, उससे कश्मीर की जनता का भरोसा डिगा और वहां के युवाओं ने चरमपंथ की राह को अपनाया. कश्मीर में चरमपंथ के लिहाज से यह अहम पड़ाव साबित हुआ.”

इसके बाद 2013 में जब भारतीय संसद पर हमले के आरोपी अफ़ज़ल गुरू को फांसी दी गई तो भी कश्मीर में विरोध प्रदर्शन देखने को मिला था. 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हुए हमले के आरोप में अफ़ज़ल गुरू को फांसी की सजा दी गई.

इस हमले में नौ लोगों की मौत हुई थी. राष्ट्रपति की ओर से दया याचिका ठुकरा दिए जाने के बाद नौ फरवरी, 2013 को दिल्ली के तिहाड़ में अफ़ज़ल गुरू को फांसी दी गई. उनका शव भी जेल परिसर में ही दफनाया गया.

उनके शव को परिवार को सौंपे जाने को लेकर कश्मीर में विरोध प्रदर्शन जरूर दिखा. कई सिविल सोसायटी संगठनों की राय में अफ़ज़ल गुरू को फेयर ट्रायल नहीं मिला था.

वैसे मौजूदा तनाव के लिए बीबीसी संवाददाता शकील अख़्तर 2010 की चरमपंथी हिंसा को भी काफ़ी श्रेय देते हैं. शकील के मुताबिक युवा पीढ़ी पर इस हिंसा का काफी असर हुआ है और उनका आक्रोश भारत सरकार के प्रति बढ़ा है.

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